बॉलीवुड ने Manoj Bajpayee को गरीबी, धोखे, स्ट्रगल और भूख के अलावा कुछ नहीं दिया। भाई साहब, सत्य जैसी कल्ट ब्लॉकबस्टर फिल्म करने के बाद भी वो घर पे बैठे रहे। कई महीनों तक काम नहीं था। बैंडेड क्वीन से जुड़े हुए हर व्यक्ति को काम मिला, लेकिन मनोज को नहीं मिला।
लेकिन 20 नवंबर 2019 – यह वो दिन था जब मनोज वाजपेयी की किस्मत बदलने वाली थी। द फैमिली मैन की रिलीज के साथ उनके 25 साल के स्ट्रगल को एक रिवॉर्ड मिलने वाला था। यह शो आगे चलकर दुनिया का फोर्थ मोस्ट पॉपुलर शो बनता है।
Manoj Bajpayee की विक्ट्री कुछ और है;
पर श्रीकांत तिवारी बने मनोज बाजपेयी की सक्सेस तो आज सब जानते हैं। वो तो बॉलीवुड से उनकी लड़ाई की एक छोटी सी जीत है। शायद जिसकी उनके मन में इतनी वैल्यू भी नहीं है।
क्योंकि मनोज बाजपेयी ऐसा एक्टर है जिसने बॉक्स ऑफिस के रेस को हटा दिया – ऐसे लात मार दी। अगर मनोज ने सत्य को एक्सेप्ट नहीं किया होता और इतना वंडरफुल जॉब नहीं किया होता, तो इरफान, नवाज जैसे लोगों को एटलीस्ट अनदर 5-6-10 साल लग जाते।
बिहार से मुंबई तक का सफर
23 अप्रैल 1969 को बिहार के बेलवा गांव के एक किसान परिवार में मनोज का जन्म हुआ। एक टिपिकल लोअर मिडिल क्लास फैमिली। उनके पिता उन्हें डॉक्टर बनते देखना चाहते थे, लेकिन मनोज का मन तो बचपन से ही नसीरुद्दीन शाह और ओम पुरी जैसे एक्टर्स की फिल्में देखकर एक्टर बनने का बन चुका था।
जब Manoj ने अमिताभ बच्चन को जंजीर में देखा, तो बस हो गया। वो सेवंथ क्लास में ही NSD (नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा) में जाने का सपना देख चुके थे।
17 साल की उम्र में दिल्ली
17 साल की उम्र में Manoj Bajpayee अपने गांव से दिल्ली आते हैं। दिल्ली यूनिवर्सिटी के रामजस कॉलेज में एडमिशन लेते हैं और बिना समय बर्बाद किए कॉलेज के पहले दिन से थिएटर करने लगते हैं।
और फिर NSD में एप्लीकेशन भरते हैं – रिजेक्ट। अगले दो साल फिर से अप्लाई करते हैं – दोनों बार रिजेक्ट।
NSD से रिजेक्शन ने Manoj Bajpayee को इतनी बुरी तरह इंपैक्ट किया कि 20 साल की उम्र में वो अपनी जान लेना चाहते थे। उनके दोस्तों को हमेशा उनके साथ रहना पड़ता था ताकि वो कोई गलत कदम ना उठाए।
बैरी जॉन का थिएटर ग्रुप – टर्निंग पॉइंट
जब NSD से रिजेक्शन मिला, तो बैरी जॉन का थिएटर ग्रुप जॉइन किया। और यही उनके करियर का टर्निंग पॉइंट बना।
यह वही समय था जब बैरी जॉन के एक्टिंग ग्रुप में मनोज वाजपेयी और शाहरुख खान एक साथ एक्टिंग सीख रहे थे। हां, वो बात अलग है कि आगे चलकर दोनों की एक्टिंग स्टाइल, फिल्म चॉइसेस और स्टारडम एक दूसरे से पोलर ऑपोजिट बना।
बैरी जॉन ने मनोज को अपना असिस्टेंट डायरेक्टर बना लिया – महीने की सैलरी ₹100।
मुंबई में भुखमरी
अर्ली 90s में डायरेक्टर शेखर कपूर ने 100 से ज्यादा एक्टर्स में से मनोज की फोटो को शॉर्टलिस्ट किया बैंडेड क्वीन के लिए। शेखर कपूर ही थे जो मनोज को कन्विंस करते हैं दिल्ली छोड़कर मुंबई आने के लिए।
बैंडेड क्वीन में मनोज को डाकू मान सिंह का रोल मिला। लोगों को पसंद भी आया, फिल्म सुपरहिट भी हो गई। लेकिन बैंडेड क्वीन की सक्सेस के बाद के 4 साल मनोज की लाइफ का सबसे लो फेस बन गया।
मुंबई आने के बाद ना खाने के पैसे थे, ना रहने के लिए घर था। दिल्ली में तो थिएटर का सहारा था, वो भी बंद हो गया। इसी बीच मनोज का डिवोर्स भी हो जाता है।
हर दिन डायरेक्टर्स और प्रोड्यूसर्स के ऑफिस के धक्के खाना, रिजेक्शन झेलना। बैंडेड क्वीन जैसी सुपरहिट फिल्म के बाद भी मनोज को अपनी एबिलिटीज पर डाउट होने लगा था।
पैसों की कमी इस हद तक बढ़ गई कि ना चाहते हुए भी टीवी सीरियल्स में काम करना पड़ा, बी ग्रेड फिल्मों में छोटे रोल्स करने पड़े।
सत्य – गेम चेंजर
साल था 1997। फिर से एक छोटी फिल्म के छोटे रोल के लिए ऑडिशन देते हैं। फिल्म थी रामगोपाल वर्मा की दौड़। बॉक्स ऑफिस पर फ्लॉप होती है।
लेकिन शूटिंग के दौरान रामगोपाल वर्मा को दिखता है एक ऐसा चेहरा जिसे वो 3 साल से ढूंढ रहे थे। और वो ऑफर करते हैं – सत्य।
1998 में रिलीज होने वाली सत्य ने सिर्फ मनोज की लाइफ नहीं बदली, बल्कि बॉलीवुड में फिल्में बनाने के तरीके को बदल दिया।
“मुंबई का किंग कौन? भीखू मात्रे।”
पहले हफ्ते फिल्म फ्लॉप रही। लेकिन फिर वर्ड ऑफ माउथ से लोगों की भीड़ थिएटर में उमड़ने लगी – अगले 25 हफ्तों तक।
सत्य की वजह से बिहार के लोगों को, छोटी जगहों के लोगों को लगा कि अगर ये बन सकता है गांव छोड़कर, तो हम क्यों नहीं? बकायदा एक पलायन हुआ। बहुत सारे यंग लोग मुंबई आने लगे।
भीखू मात्रे की परफॉर्मेंस
Manoj Bajpayee को सत्य के लिए अपना पहला नेशनल अवार्ड मिला। एक अवार्ड सेरेमनी में जब बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर का अवार्ड सलमान खान को दिया गया, तो ऑडियंस में बैठे लोग “भीखू मात्रे” का नाम चिल्लाने लगे।
सलमान ने भी स्टेज पर जाकर एक्सेप्ट किया कि “पता नहीं मुझे क्यों दिया। ये तो मनोज डिजर्व करता है।”
कमर्शियल सिनेमा के खिलाफ लड़ाई
सत्य के बाद Manoj Bajpayee को ऑफर्स तो आने लगे, पैसों की कमी भी कुछ हद तक पूरी हो गई। लेकिन यहीं वो मोमेंट था जहां पैसे कमाने के लिए मनोज कमर्शियल फिल्में आसानी से कर सकते थे।
लेकिन Manoj Bajpayee ने ऐसा नहीं किया। भुखमरी में और गरीबी में पैसे को और काम को मना करना बहुत परेशानी वाला काम था। लेकिन मनोज ने किया।
अगले 5 सालों में मनोज हर वो फिल्म करते हैं जो वो करना चाहते थे – जिसकी कहानी उन्हें अच्छी लगती थी। भले ही पता था कि बॉक्स ऑफिस पर नहीं चलेंगी।
“मुझे फ्लॉप फिल्मों से डर नहीं लगता। मुझे बुरी फिल्म से डर लगता है।”
यह लड़ाई थी हर उस एक्टर के लिए जिसके पास कन्वेंशनल बॉलीवुड हीरो बनने के लिए वो लुक्स नहीं थे। यह लड़ाई थी नवाजुद्दीन सिद्दीकी, राजकुमार राव, पंकज त्रिपाठी और विनीत कुमार सिंह जैसे एक्टर्स की एग्जिस्टेंस के लिए।
गैंग्स ऑफ वासेपुर – दूसरी जीत
2010 में प्रकाश झा की राजनीति में दुर्योधन का कैरेक्टर मनोज को फिर से रिकग्निशन देता है।
लेकिन असली टर्निंग पॉइंट आता है 2012 में – गैंग्स ऑफ वासेपुर में सरदार खान के किरदार के साथ।
“हजरात हजरात हजरात…”
गैंग्स ऑफ वासेपुर ने मनोज के करियर को एक नई लाइफलाइन दी। अब बॉलीवुड के पास ऐसे फिल्म मेकर्स, ऐसी कहानियां आ चुकी थीं जो मनोज के ट्रू पोटेंशियल को यूटिलाइज कर सकते थे।
2012 के बाद अगले 6 सालों में मनोज अपने करियर की सबसे आइकॉनिक परफॉर्मेंसेस देते हैं:
- पीड्या सिंह – एक कंट्रोवर्शियल मैराथन कोच का रोल
- अलीगढ़ – एक होमोसेक्सुअल प्रोफेसर का रोल
- गली गुलियां – एक पैरानाइड मेंटली डिस्टर्ब्ड इंसान का रोल
गली गुलियां के किरदार को निभाने के लिए मनोज इस हद तक पागल इंसान बन चुके थे कि 26 दिन बाद उनके सर में सीटी बजनी शुरू हो गई। फिल्म की शूटिंग बीच में रोकनी पड़ी। डॉक्टर ने कहा – “ये ब्रेकडाउन की निशानी है।”
द फैमिली मैन – आखिरकार स्टारडम
2019 में आती है द फैमिली मैन। श्रीकांत तिवारी का कैरेक्टर शायद मनोज के सबसे पॉपुलर कैरेक्टर्स में से एक है।
यह शो दुनिया का फोर्थ मोस्ट पॉपुलर शो बन चुका है। मनोज शायद अपनी लाइफ में पहली बार एक सुपरस्टार का टैग ओन करते हैं।
25 साल बाद मनोज वाजपेयी को अपने हार्ड वर्क, सिनेमा के लिए अपनी ऑनेस्टी, अपने ऑब्सेशन का ड्यू क्रेडिट मिला।
आज भी जारी है लड़ाई
डिस्पाइट द सक्सेस ऑफ द फैमिली मैन, मनोज आज भी उस सिनेमा के लिए ऑनेस्ट हैं जिसने उन्हें बैंडेड क्वीन और सत्य जैसी मूवीज करने के लिए मजबूर किया था।
गुलमोहर, बंदा, साइलेंस – ये वो फिल्में हैं जो आज मनोज करना अफोर्ड कर सकते हैं। भले ही पता है कि ये फिल्में शायद बॉक्स ऑफिस पर कभी सक्सेसफुल नहीं होने वाली।
पर अपनी कल्ट ऑडियंस, अपनी इनर सेटिस्फेक्शन और एक्टिंग से प्यार करने वाली अगली जनरेशन के लिए – मनोज के लिए ऐसी फिल्में करना पूरी तरह से सेंस बनाता है।
फाइनल वर्ड
मनोज वाजपेयी 30 साल से इंडस्ट्री में सर्वाइव कर चुके हैं। लेकिन नसीरुद्दीन शाह और ओम पुरी का वो सिनेमा जिसने उन्हें एक्टर बनने के लिए इंस्पायर किया था – उसके लिए वो लड़ाई आज भी लड़ रहे हैं।
यह कहानी है एक ऐसे एक्टर की जिसने बॉलीवुड के सभी रूल्स तोड़ दिए। जिसने बॉक्स ऑफिस को लात मार दी। और अपनी शर्तों पर, अपनी पसंद की फिल्में करके – एक लेजेंड बन गया।

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